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Home Uttarakhand

एमपीजी कॉलेज मसूरी: प्रबंधन समिति के गठन में भारी अनियमितताएं

Panchayat Reporter by Panchayat Reporter
February 12, 2026
in Uttarakhand, उत्तराखंड, देहरादून, बड़ी खबर
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एमपीजी कॉलेज मसूरी: प्रबंधन समिति के गठन में भारी अनियमितताएं
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देहरादून/मसूरी: हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय द्वारा एमपीजी कॉलेज (म्युनिसिपल पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज), मसूरी की प्रबंधन समिति के गठन को लेकर बुलाई गई बैठक में कॉलेज प्रशासन की अनुपस्थिति और पारदर्शिता की कमी ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित बैठक दिनांक 6फरवरी को गूगल मीट के माध्यम से वर्चुअल रूप से की गई हालांकि हैरानी की बात यह रही कि कॉलेज की ओर से न तो प्राचार्य और न ही कोई अन्य प्रतिनिधि अपने पक्ष को स्पष्ट करने या उठाए गए सवालों का जवाब देने के लिए उपस्थित हुआ। कॉलेज के प्राचार्य ने ऑनलाइन या फोन के माध्यम से भी जुड़ने की जहमत नहीं उठाई।
यूपी राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 यथा प्रवत्त उत्तराखंड मे लागू के की धारा 2(13)के अनुसार ऐसे महाविद्यालय जिनका संचालन नगरपालिका द्वारा किया जा रहा है, वहाँ प्रबंधतंत्र की जगह उस निकाय की शिक्षा समिति का गठन होना चाहिए। जबकि म्यूनिसिपल पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज मसूरी मे अनियमित रूप से प्रबंध तंत्र का गठन किया जा रहा है।

क्या हैं मुख्य अनियमितताएं?
1. संचालन संस्था का अस्पष्ट दर्जा: व्हिसल ब्लोअर्स ने सबसे अहम सवाल यह उठाया कि यदि यह कॉलेज नगर पालिका परिषद, मसूरी द्वारा संचालित नहीं है, तो आखिर इसे कौन चला रहा है? यदि कोई सोसायटी या ट्रस्ट इसका संचालन कर रहा है, तो उसका पंजीकरण संख्या क्या है? कॉलेज प्रशासन न तो सोसायटी का विवरण दे पा रहा है और न ही मान रहा है कि यह ‘नगर पालिका द्वारा अनुरक्षित’ (Maintained) है।
2. नगर पालिका और सुरक्षा निधि (Security Money): यदि कॉलेज नगर पालिका बोर्ड द्वारा संचालित नहीं है, तो उसे धारा 13.06 के तहत सुरक्षा निधि जमा करने से छूट क्यों दी गई? और यदि उसने यह छूट ‘नगर पालिका द्वारा अनुरक्षित’ होने के आधार पर ली है,तो उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 (उत्तराखंड में यथालागू) की धारा 2(13) के तहत उसे एक ‘शिक्षा समिति’ का गठन करना अनिवार्य है, न कि अन्य अशासकीय सहायता प्राप्त कॉलेजों की तर्ज पर ‘प्रबंधन समिति’।
3. बायलॉज (उपविधियों) की मूल प्रति गायब: कॉलेज प्रशासन अपनी उपविधियों (Bylaws)/ संविधान की मूल प्रति (Original Copy) दिखाने में विफल रहा है। सूत्र बताते हैं कि मूल प्रति न होने से यह आशंका प्रबल हो जाती है कि प्रबंधन अपने निजी स्वार्थ के लिए नियमों में कभी भी फेरबदल कर सकता है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि इन उपविधियों/संविधान को किस सक्षम प्राधिकारी ने अनुमोदित किया है, जो मामले को और अधिक संदिग्ध बनाता है।
4. अवैध प्रबंधन और वेतन संकट: नियमों के अनुसार, प्रबंधन समिति का गठन उन कॉलेजों के लिए होता है जो नगर पालिका द्वारा संचालित नहीं होते। कॉलेज प्रशासन दो विपरीत नियमों का पालन एक साथ नहीं कर सकता। कॉलेज में अनुमोदित प्रबंधन समिति न होने के कारण अधिनियम की धारा 60E का उल्लंघन हो रहा है, जिसके चलते कर्मचारी अक्टूबर 2025 से वेतन से वंचित हैं।
5. कार्यकाल में विसंगति: कॉलेज द्वारा नगरपालिका द्वारा पारित जिस प्रस्ताव के आधार पर प्रबंधतंत्र/ समिति के गठन व तीन साल के कार्यकाल की मांग की जा रही है, वह वास्तव में मसूरी नगरपालिका की ‘विभागीय समिति’ का प्रस्ताव है, जिसका कार्यकाल केवल एक वर्ष होता है। यह प्रयास कॉलेज प्रशासन की अनियमित कार्यप्रणाली को दर्शाता है।
6. राज्य प्रतिनिधि की अनुपस्थिति: हैरानी की बात यह भी है कि जबकि राज्य सरकार कर्मचारियों के वेतन का भुगतान करती है, फिर भी इस महत्वपूर्ण बैठक में राज्य के किसी भी प्रतिनिधि को नहीं बुलाया गया, जो अत्यंत आश्चर्यजनक है।
विश्वविद्यालय से मांग: आज जब यह बात संज्ञान में आ गई है, आवश्यक है कि महाविद्यालय के विधिपूर्वक संचालन के लिए इसके बायलॉज में संशोधन करके प्रबंध तंत्र की जगह अधिनियम के अनुसार शिक्षा समिति का गठन किया जाए किंतु कॉलेज प्रशासन द्वारा इसका संज्ञान नहीं लिया जा रहा है। खामियाजा कॉलेज स्टाफ को भुगतना पड़ रहा है, जिसे कि विगत पाँच महीने से वेतन नहीं मिला है।
विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की है कि कॉलेज द्वारा पूर्व में प्रस्तुत किए गए जवाब और दस्तावेजों की प्रति उन्हें उपलब्ध कराई जाए। उन्होंने ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत’ (Principle of Natural Justice) के तहत अंतिम निर्णय लेने से पहले उन्हें अपना पक्ष रखने का एक और अवसर देने का आग्रह किया है।
चेतावनी दी गई है कि यदि व्यापक छात्र हित और कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े इस मामले में उचित कार्यवाही नहीं की गई, तो वे उच्च अधिकारियों और न्यायालय की शरण लेने को बाध्य होंगे।

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