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Home Uttarakhand

उत्तराखंड में तीन IPS अधिकारियों का जबरन डेप्यूटेशन ? यस बॉस ना कहने की सजा ?

Panchayat Reporter by Panchayat Reporter
March 8, 2026
in Uttarakhand, उत्तराखंड, देहरादून, बड़ी खबर, स्पेशल
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उत्तराखंड में तीन IPS अधिकारियों का जबरन डेप्यूटेशन ?  यस बॉस ना कहने की सजा ?
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देहरादून: उत्तराखंड कैडर के तीन वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों को केंद्र सरकार की एजेंसियों में प्रतिनियुक्ति पर भेजे जाने के बाद प्रशासनिक हलकों में कई सवाल उठने लगे हैं। आधिकारिक तौर पर इसे नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया बताया जा रहा है, लेकिन सूत्रों के अनुसार इस पूरे घटनाक्रम के पीछे नौकरशाही की डर्टी पॉलटिक्स के हस्तक्षेप का इशारा मिल रहा है ।

इन अधिकारियों में मुख्तार मोहसिन, नीरू गर्ग और अरुण मोहन जोशी शामिल हैं, जिन्हें हाल ही में केंद्र सरकार के विभिन्न संगठनों में तैनाती दी गई है।

 

किन एजेंसियों में मिली तैनाती

केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश के अनुसार:

मुख्तार मोहसिन को National Crime Records Bureau में डीआईजी स्तर पर तैनात किया गया है।

नीरू गर्ग को Indo-Tibetan Border Police में डीआईजी बनाया गया है।

अरुण मोहन जोशी को Border Security Force में डीआईजी पद पर भेजा गया है।

इन नियुक्तियों का आदेश Ministry of Home Affairs (India) ने जारी किया है।

 

आवेदन नहीं करने के बावजूद भेजे जाने की चर्चा

सूत्रों के अनुसार इन तीनों अधिकारियों ने केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए स्वयं आवेदन नहीं किया था। बताया जा रहा है कि राज्य सरकार ने उनके नाम केंद्र को भेजे, जिसके बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने प्रतिनियुक्ति के आदेश जारी कर दिए।

यही कारण है कि पुलिस और प्रशासनिक हलकों में इसे “फोर्स्ड डेप्यूटेशन” के रूप में देखा जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार पिछले वर्ष भी इन अधिकारियों की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति को लेकर विवाद सामने आया था। बताया जाता है कि उस समय प्रतिनियुक्ति के आदेश जारी होने के बावजूद उन्होंने जॉइनिंग नहीं की थी। इसके बाद केंद्र सरकार की ओर से उन्हें कुछ समय के लिए केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से डिबार किए जाने की कार्रवाई भी की गई थी।

लेकिन इसी साल फरवरी महीने में सरकार ने इन तीनों अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति के लिए केंद्र सरकार को पत्र लिखा ।

सूत्र बताते हैं कि इन अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर भेजे जाने को सरकार के कुछ नौकरशाहों ने अपने राजनीतिक आका को खुश करने के लिए इसे अपना मिशन बना लिया था ।

खास बात तो ये है कि पुलिस मुख्यालय की तरफ से  डैप्यूटेशन पर भेजे जाने वाले अफसरों के नामों की कोई लिस्ट शासन को भेजी ही नहीं गई  । लेकिन अफसरों की एक चौकड़ी ने अपने पॉलिटिकल आका की सहमति से, बिना इन अफसरों के संज्ञान में लाए ये पैंतरा चला ।और यस बॉस ना कहने की सजा सुनाते हुए इन अफसरों को डेप्यूटेशन पर भेज दिया गया ।

 

पद स्तर को लेकर भी सवाल

एक और दिलचस्प पहलू यह है कि उत्तराखंड में ये अधिकारी आईजी स्तर की जिम्मेदारियां संभाल रहे थे, जबकि केंद्र में उन्हें डीआईजी स्तर पर तैनाती दी गई है।

हालांकि प्रशासनिक सेवा में यह स्थिति असामान्य नहीं मानी जाती, लेकिन इस मामले में इसे लेकर भी चर्चा तेज है।

 

अरुण मोहन जोशी की जांच बनी चर्चा का कारण

सूत्रों के अनुसार इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक चर्चा अरुण मोहन जोशी को लेकर हो रही है।

बताया जा रहा है कि वे हाल के महीनों में Crime Branch CID Uttarakhand में एक संवेदनशील मामले की जांच कर रहे थे।ये मामला नैनीताल के जिला पंचायत अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनावों से जुडा हुआ था । और मामले में हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया हुआ था । अरुण मोहन जोशी ने बतौर आई जी इस पर ताबडतोड कार्रवाई शुरु की । जिसके बाद ऐसा माना जा रहा है कि सरकार असहज हो गई ।

सूत्रों के अनुसार इसी कारण उन्हे बीच जांच से हटा दिया गया । और आनंद भरणे को जांच सौंपी गई ।

 

 

 

नीरु गर्ग ने भी की एक अहम जांच

डी आई जी गढवाल रहते हुए नीरु गर्ग भी त्रिवेंद्र रावत सरकार में बैठाई गई सिडकुल घोटाले की जांच बेहद तेजी से कर रही थीं । जिसमें कई सफेदपोशों के नाम शामिल थे । हालांकि त्रिवेंद्र के सत्ता से बेदखल होने और नीरु गर्ग के पद से हटने के बाद ये जांच ठंडे बस्ते में चली गई।

इसके अलावा नीरु गर्ग को 2021 चमोली जिले में आई रैंणी आपदा में बेहतरीन काम करने के लिए जाना जाता है ।

 

 

क्या जांच और डेप्यूटेशन का संबंध है?

प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि अरुण मोहन जोशी से जांच वापस लिए जाने और उसके बाद केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर भेजे जाने की टाइमिंग ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

कुछ अधिकारी मानते हैं कि यह महज संयोग हो सकता है, जबकि अन्य का कहना है कि राज्य सरकार ने प्रशासनिक संतुलन बनाए रखने के लिए यह फैसला लिया हो सकता है।

वहीं नीरु गर्ग के मामले में भी ये बताया जा रहा है कि सिडकुल घोटाले की जांच में उन्होने अपनी धार इतनी पैनी कर ली

कि नए निजाम को इससे परेशानी होने लगी थी ।

 

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IPS डेप्यूटेशन सिस्टम कैसे काम करता है

भारतीय पुलिस सेवा में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है। इसमें राज्य कैडर के अधिकारियों को कुछ समय के लिए केंद्र सरकार की एजेंसियों में काम करने भेजा जाता है।

आमतौर पर IPS अधिकारियों को इन एजेंसियों में तैनाती मिलती है:

Central Bureau of Investigation

Intelligence Bureau

Border Security Force

Central Reserve Police Force

सामान्यतः अधिकारी स्वयं आवेदन करते हैं और राज्य सरकार उनकी अनुमति देकर नाम केंद्र को भेजती है।लेकिन इस मामले में तो बताया जा रहा है कि अधिकारियों को ये जानकारी ही नहीं थी कि उनका नाम प्रतिनियुक्ति के लिए भेजा जा रहा है।

 

तीन आईपीएस अधिकारियों का केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाना आधिकारिक तौर पर एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बताया जा रहा है। हालांकि अरुण मोहन जोशी से एक संवेदनशील जांच वापस लिए जाने और उसके तुरंत बाद उनके डेप्यूटेशन पर भेजे जाने की टाइमिंग ने इस फैसले को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

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