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Home Uttarakhand

400 करोड़ खर्च के बाद भी खेत सूखे, PMKSY की ड्रिप सिंचाई पर उठे सवाल

Panchayat Reporter by Panchayat Reporter
September 12, 2026
in Uttarakhand, उत्तराखंड, देहरादून, बड़ी खबर
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400 करोड़ खर्च के बाद भी खेत सूखे, PMKSY की ड्रिप सिंचाई पर उठे सवाल
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देहरादून। किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाने और कम पानी में अधिक उत्पादन का लक्ष्य लेकर चलाई जा रही प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ (PDMC) कार्यक्रम के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों और थर्ड पार्टी मूल्यांकन से सामने आई जानकारियों के आधार पर योजना में लाभार्थी सत्यापन, ड्रिप सिस्टम की स्थापना, प्रशिक्षण, रखरखाव और निगरानी को लेकर अनियमितताओं के आरोप लगाए गए हैं।

आरटीआई एक्टिविस्ट एवं अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने इस मामले में प्रदेश के विभिन्न जिलों के जिलाधिकारियों को शिकायत भेजकर जांच की मांग की है। देहरादून में उनकी शिकायत के बाद जिलाधिकारी आशीष चौहान ने मामले में मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दिए हैं।

400 करोड़ से अधिक खर्च, लेकिन किसानों को कितना मिला लाभ?

शिकायत में दावा किया गया है कि कृषि एवं उद्यान विभाग के माध्यम से PMKSY के PDMC कार्यक्रम पर अब तक करीब 400 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च की जा चुकी है। योजना का उद्देश्य किसानों को ड्रिप और अन्य माइक्रो-इरिगेशन तकनीक उपलब्ध कराकर पानी की बचत करना और कृषि उत्पादकता बढ़ाना है।

लेकिन आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों और मूल्यांकन रिपोर्टों में कई स्थानों पर ऐसे मामले सामने आने का दावा है, जहां ड्रिप सिंचाई प्रणाली या तो काम नहीं कर रही थी या किसानों को पूरी तकनीकी सहायता नहीं मिली।

सवाल यही है कि जब करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी किसान उस सिस्टम का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं, तो योजना का वास्तविक लाभ किसे मिला?

पौड़ी में ड्रिप सिस्टम की जगह मिले पाइप के अवशेष

थर्ड पार्टी मूल्यांकन में पौड़ी गढ़वाल के वर्ष 2016-17 और 2017-18 में स्थापित ड्रिप सिंचाई सिस्टम का भी निरीक्षण किया गया।

मूल्यांकन रिपोर्ट के अनुसार कुछ स्थानों पर किसानों को योजना का लाभ मिलने के बावजूद बाद में रखरखाव और तकनीकी सहायता के अभाव में सिस्टम बंद हो गए। कुछ खेतों में पूरी ड्रिप सिंचाई प्रणाली के बजाय केवल ड्रिप पाइप के अवशेष मिलने की बात सामने आई।

कुछ मामलों में सामग्री किसानों को उपलब्ध कराए जाने का उल्लेख है, लेकिन सिस्टम की विधिवत स्थापना नहीं किए जाने की बात भी मूल्यांकन में सामने आई।

रुद्रप्रयाग में सामग्री मिली, लेकिन सिस्टम चलाने की ट्रेनिंग नहीं

रुद्रप्रयाग में भी मूल्यांकन के दौरान किसानों से मिली जानकारी योजना के क्रियान्वयन पर सवाल खड़े करती है।

रिपोर्ट के अनुसार कुछ किसानों ने बताया कि उन्हें आपूर्तिकर्ताओं की ओर से सामग्री तो उपलब्ध कराई गई, लेकिन ड्रिप सिस्टम की स्थापना, परीक्षण और संचालन का पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं दिया गया।

ऐसे में किसान सिस्टम का सही इस्तेमाल और रखरखाव नहीं कर पाए। जबकि योजना का मूल उद्देश्य ही ऐसी तकनीक उपलब्ध कराना है जिससे पानी की बचत हो और उत्पादन बढ़े।

पिथौरागढ़ में भी सामने आई ऐसी ही तस्वीर

पिथौरागढ़ में किए गए मूल्यांकन में भी कुछ लाभार्थियों को केवल पाइप, फिल्टर और ड्रिपर उपलब्ध कराए जाने की बात सामने आई।

शिकायत में कहा गया है कि कई मामलों में सिस्टम की स्थापना और किसानों को आवश्यक प्रशिक्षण नहीं मिला। इससे योजना के वास्तविक उद्देश्य और सरकारी खर्च के परिणाम को लेकर सवाल उठते हैं।

ऑडिट रिपोर्ट में भी उठे सवाल

मामले में केवल फील्ड स्तर के मूल्यांकन ही नहीं, बल्कि ऑडिट से जुड़े दस्तावेजों का भी हवाला दिया गया है।

शिकायतकर्ता के अनुसार चार्टर्ड अकाउंटेंट की ऑडिट रिपोर्ट में लाभार्थियों के सत्यापन, दस्तावेजों के रखरखाव, निरीक्षण प्रक्रिया और अभिलेखों के संधारण से संबंधित कमियां सामने आई हैं।

इसके अलावा योजना के शासनादेशों और दिशा-निर्देशों के अनुपालन, निगरानी एवं मूल्यांकन व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायत में CAG और आंतरिक ऑडिट से संबंधित आपत्तियों का भी उल्लेख किया गया है।

अब जिलों में होगी जांच

विकेश सिंह नेगी ने मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए राज्य के विभिन्न जिलाधिकारियों को शिकायत भेजी है। बताया गया है कि कुछ जिलों में मुख्य विकास अधिकारियों को जांच अधिकारी बनाया गया है, जबकि देहरादून में जिलाधिकारी स्तर से मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दिए गए हैं।

अब जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि—

– योजना के तहत कितनी राशि जारी और खर्च हुई?
– कितने किसानों को ड्रिप सिंचाई सिस्टम दिए गए?
– कितने सिस्टम वास्तव में खेतों में स्थापित हुए?
– कितने सिस्टम वर्तमान में काम कर रहे हैं?
– क्या लाभार्थियों का वास्तविक सत्यापन हुआ?
– किसानों को सिस्टम चलाने और रखरखाव का प्रशिक्षण दिया गया या नहीं?
– खराब या अनुपयोगी सिस्टम के रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी थी?
– और सबसे महत्वपूर्ण, 400 करोड़ रुपये से अधिक के सरकारी खर्च का जमीनी परिणाम क्या रहा?

मामले में जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि ये कमियां केवल क्रियान्वयन की लापरवाही थीं या योजना में वित्तीय एवं प्रशासनिक स्तर पर भी गंभीर अनियमितताएं हुई हैं।

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