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Home Uttarakhand

पर्यटन बोर्ड में “भ्रष्टाचार” का एडवेंचर स्पोर्टस

Panchayat Reporter by Panchayat Reporter
December 10, 2025
in Uttarakhand, देहरादून, बड़ी खबर
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पर्यटन बोर्ड में “भ्रष्टाचार” का एडवेंचर स्पोर्टस
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उत्तराखंड पर्यटन विकास बोर्ड में पैराग्लाइडिंग ट्रेनिंग और इवेंट्स से जुड़ा एक बड़ा घोटाला सामने आया है। आरोप है कि बोर्ड ने महाराष्ट्र के एक व्यक्ति तानाजी ताकवे और उनकी कंपनी ‘पैराग्लाइडिंग मंत्रा’ को बिना योग्यता, बिना अनुभव की उचित जांच परख और बिना किसी वैरिफिकेशन के करोड़ों रुपये के काम सौंप और पूरे उत्तराखण्ड में नए पैराद्लाईडर्स की पौध तैयार करने का जिम्मा दे दिए। सवाल यह है कि क्या बिना किसी डिग्री, प्रमाणपत्र और तकनीकी जांच के, किसी को युवाओं की जान दांव पर लगाने वाले एडवेंचर स्पोर्ट जैसी जिम्मेदारी दी जा सकती है?
बिना क्वालिफिकेशन के करोड़ों का जिम्मा
आर टी आई के मुताबिक उत्तराखंड पर्यटन विकास बोर्ड ने 2023 से 2025 तक राज्य में पैराग्लाइडिंग ट्रेनिंग और बड़े बड़े इवेंट आयोजित करने की जिम्मेदारी तानाजी ताकवे की कंपनी ‘पैराग्लाइडिंग मंत्रा’ को दे दी। उन्हें टिहरी झील को अंतरराष्ट्रीय स्तर का एडवेंचर हब बनाने का “मेंटोर” घोषित किया गया, जबकि बोर्ड के पास न तो उनकी शैक्षणिक योग्यता का कोई रिकॉर्ड है, न ही इस बात का कि वे खुद पैराग्लाइडिंग इंस्ट्रक्टर बनने की न्यूनतम शर्तें पूरी करते हैं या नहीं। सबसे बडी बात तो ये कि बोर्ड के दस्तावेजों और एरो स्पोर्टस की नियामावली में मेंटोर शब्द का कोई जिक्र ही नहीं है । ऐसा लगता है कि जैसे तानाजी ताकवे को फायदा पहुँचाने के लिए ये शब्द पर्यटन विकास परिषद के बाबूओं ने अपनी फाईलों के नाजाज गर्भ से इसका प्रसव कराया । आरटीआई के जवाबों में पर्यटन बोर्ड ने साफ लिखा कि कंपनी के स्टाफ, उनके लाइसेंस और तानाजी की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग तक की जानकारी उनके पास उपलब्ध नहीं है।
नियमावली ताक पर, मेंटोर बना दिया
राज्य सरकार ने 2018 में एरो स्पोर्ट्स नीति बनाई थी, जिसमें पैराग्लाइडिंग इंस्ट्रक्टर के लिए साफ मानक तय हैं – जैसे कम से कम 35 किलोमीटर की प्रमाणित उड़ान, डिजिटल लॉग, न्यूनतम 12वीं पास व विभिन्न फ्लाइंग स्टाइल में दक्षता। इन्हीं इंस्ट्रक्टरों की ट्रैनिंग से भविष्‍य के पायलट तैयार होने हैं। इसके उलट, तानाजी ताकवे को इन मानकों से ऊपर रखकर – “मेंटोरशिप” – दे दी गई। अवैध मेंटोर के पास अब असीमित ताकत आ गई । स्ट्रक्टरों को मार्गदर्शन देना, ट्रेनिंग स्ट्रक्चर तैयार कर ना और पूरे प्रोग्राम की गुणवत्ता सुनिश्चित करना।
लेकिन आरटीआई दस्तावेज़ बताते हैं कि न तो उनकी उड़ानों का डिजिटल लॉग देखा गया, न शैक्षणिक योग्यता, न ही यह परखा गया कि वे पी 1, पी 2, पी 3, SIV, क्रॉस कंट्री, थर्मलिंग जैसी उन्नत विधाओं के लिए योग्य हैं।
सिर्फ सबसे सस्ती कोटेशन के बदले “सर्वेसर्वा”
कहानी की शुरुआत 2023 में तब हुई, जब बोर्ड ने SIV (स्पेशलाइज्ड इन फ्लाइट ट्रेनिंग) कराने के लिए कोटेशन मंगाए। 11 कंपनियों में पैराग्लाइडिंग मंत्रा ने प्रति व्यक्ति 25 हजार रुपये की सबसे कम दर दी और उसे ट्रेनिंग का काम मिल गया। इसके बाद तत्कालीन एसीईओ कर्नल अश्विनी पुंडीर ने एक नोटिंग में लिखा कि टिहरी झील को एडवेंचर हब बनाने के लिए “बेहतरीन मेंटोर उचित दामों पर” चाहिए, और पैराग्लाइडिंग मंत्रा ने पहली बार राज्य में SIV कोर्स कराकर पायलटों का आत्मविश्वास बढ़ाया है। यह फाइल सीईओ सचिन कुर्वे के पास गई और उन्होंने बिना किसी तकनीकी टिप्पणी या अतिरिक्त जांच के इसे मंजूरी दे दी। नतीजा यह हुआ कि 2023 से 2025 तक पूरे उत्तराखंड में पैराग्लाइडिंग ट्रेनिंग और इवेंट्स का सर्वेसर्वा वही कंपनी बन गई जिसके योग्यता का कोई अका पता ही नहीं है । और अब तक केवल ट्रेनिंग के नाम पर ही उसे 10 करोड़ रुपये से ज्यादा का भुगतान हो चुका है।
न तकनीकी समिति सक्रिय, न कोर्स की मान्यता
एरो स्पोर्ट्स नीति के अनुसार किसी भी ट्रेनर या एजेंसी के मूल्यांकन के लिए तकनीकी समिति गठित होनी चाहिए, जो उसकी उड़ान अनुभव, प्रमाणपत्र और कोर्स डिजाइन की जांच करे। उपलब्ध दस्तावेजों में ऐसी किसी सक्रिय तकनीकी समिति का उल्लेख तक नहीं मिलता। न ही यह रिकॉर्ड है कि तानाजी के द्वारा तैयार ट्रेनिंग कोर्स को राज्य स्तर पर कभी मान्यता दी गई। उल्टा, जिन्हें खुद जांचा जाना चाहिए था, वही तानाजी ताकवे 2023 में स्थानीय पैराग्लाइडर्स के डिजिटल लॉग की जांच कर रहे थे और उनके आधार पर युवाओं को इंस्ट्रक्टर लाइसेंस जारी किए गए। यानी बोर्ड ने स्थानीय युवाओं पर तो सख्त जांच लागू की, लेकिन वही जांच वो बाहरी कंपनी और उसके मालिक पर करना भूल गया ।
तानाजी के प्रमाणपत्रों पर भी सवाल
जब बोर्ड के पास जानकारी नहीं मिली तो पंचायत रिपोर्टर की टीम ने सीधे तानाजी ताकवे से संपर्क किया। ई मेल के जरिए उनसे उनकी शैक्षणिक योग्यता, उड़ान अनुभव और प्रमाणपत्र मांगे गए। उन्होंने खुद को International Association of Paragliding Pilots and Instructors (APPI), Paragliding Association of India (PAI) और British Hang Gliding and Paragliding Association से प्रमाणित इंस्ट्रक्टर बताया, लेकिन शिक्षा और उड़ान लॉग से जुड़ी जानकारी देने से या तो बचते रहे या इसे “व्यक्तिगत” बताकर साझा करने से मना कर दिया। उनकी कंपनी की वेबसाइट पर कुछ सर्टिफिकेट और प्रशस्ति पत्र जरूर दिखे, पर ज्यादातर की वैधता सीमित अवधि की थी और कई प्रमाणपत्र उन संस्थाओं के हैं, जिनका उल्लेख उत्तराखंड की एरो स्पोर्ट्स नीति में अनिवार्य योग्यता के रूप में किया ही नहीं गया है। देश के इकलौते BHPA लाइसेंस प्राप्त प्रशिक्षक गुरप्रीत ढींडसा जैसे विशेषज्ञ स्पष्ट कहते हैं कि ऐसे सर्टिफिकेट किसी को अपने आप “इंस्ट्रक्टर” मान लेने या सरकारी मान्यता देने के लिए पर्याप्त नहीं होते।
सुरक्षा से खिलवाड़ या सिस्टम की मिलीभगत?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस व्यक्ति की बुनियादी योग्यता और उड़ान अनुभव का रिकॉर्ड तक शासन प्रशासन के पास नहीं, उसे आसमान में खेले जाने वाले सबसे जोखिम भरे खेलों में से एक की ट्रेनिंग और राज्य के युवाओं के भविष्य की कमान सौंप दी गई। महज “कम फीस” और एक बार का SIV कोर्स करवा देने के आधार पर किसी निजी कंपनी को पूरे प्रदेश का मेंटोर बना देना न केवल नियमों की खुलेआम अनदेखी है, बल्कि यह सुरक्षा मानकों के साथ सीधा खिलवाड़ भी है। यह मामला सिर्फ आर्थिक अनियमितता का नहीं, बल्कि सिस्टम की जवाबदेही और युवाओं की जान की कीमत पर लिए गए फैसलों का भी है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड सरकार इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराएगी, टेक्निकल ऑडिट कराएगी और जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब मांगेगी, या फिर पैराग्लाइडिंग के नाम पर चल रहा यह “एडवेंचर” यूं ही आसमान में बिना पैराशूट के उड़ान भरता रहेगा?

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