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कैग रिपोर्ट ने खोली नमामि गंगे की पोल: उत्तराखंड में 21 STP बिना घर कनेक्शन, घाट श्मशान सूने, कचरा सीधा गंगा में

2014 से 2023 के बीच गंगा पुनर्जीवन परियोजनाओं के लिए 14,260 करोड़ रुपये जारी, मिशन II के लिए 22,500 करोड़ की मंजूरी; लेकिन उत्तराखंड में न तो नदी बेसिन प्लान बना, न ही घरों को सीवर नेटवर्क से जोड़ा जा सका।

Panchayat Reporter by Panchayat Reporter
March 13, 2026
in Uttarakhand, उत्तराखंड, देहरादून, बड़ी खबर, स्पेशल
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कैग रिपोर्ट ने खोली नमामि गंगे की पोल: उत्तराखंड में 21 STP बिना घर कनेक्शन, घाट श्मशान सूने, कचरा सीधा गंगा में
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नमामि गंगे को केंद्र सरकार ने एक “अम्ब्रेला प्रोग्राम” के रूप में शुरू किया, जिसके तहत पुराने और चल रहे सभी गंगा सफाई प्रयासों को जोड़ा गया – पुराने STP की मरम्मत, नए STP, घाट और शवदाह गृहों का विकास, ठोस कचरा प्रबंधन, वनीकरण व जैव विविधता संरक्षण जैसी गतिविधियाँ।
2014 से 2023 के बीच राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) ने गंगा पुनर्जीवन से जुड़ी परियोजनाओं के लिए राज्यों, राज्य मिशन और अन्य एजेंसियों को कुल 14,260 करोड़ रुपये जारी किए, जिनमें से 1,149 करोड़ रुपये उत्तराखंड को मिले। गंगा की लंबाई और कार्यक्रम की व्यापकता को देखते हुए सरकार ने नमामि गंगे मिशन II भी मंजूर किया है, जिसकी कुल लागत 22,500 करोड़ रुपये है – इसमें 11,225 करोड़ पुराने दायित्वों और 11,275 करोड़ नए प्रोजेक्ट्स के लिए रखे गए हैं, लक्ष्य वर्ष 2026 तक।

सात स्तर का ढांचा, लेकिन नदी बेसिन प्लान ही नहीं
गंगा सफाई के लिए 2016 के River Ganga (Rejuvenation, Protection and Management) Authorities Order और जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के तहत उत्तराखंड में सात प्रमुख हिस्सेदारों वाली व्यवस्थागत संरचना बनाई गई – राज्य गंगा समिति और SMCG, जिला गंगा समितियाँ, उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UKPCB), शहरी निकाय, ग्राम पंचायतें, कार्यान्वयन एजेंसियाँ (जैसे उत्तराखंड पेयजल निगम, सिंचाई विभाग, वन विभाग) और जल संस्थान जैसी मेंटेनेंस एजेंसियाँ।
कैग ऑडिट ने पाया कि SMCG अपनी स्थापना के 13 वर्ष बाद भी राज्य स्तर का river basin management plan तैयार नहीं कर सकी। गंगा और उसकी सहायक नदियों से जुड़े जिलों – उत्तरकाशी, टिहरी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पौड़ी, देहरादून और हरिद्वार – में किसी भी जिला गंगा समिति ने जिला स्तर नदी बेसिन योजना नहीं बनाई, जबकि यह उनकी मुख्य जिम्मेदारी थी। नतीजा यह हुआ कि सीवरेज समस्याओं को टुकड़ों में निपटाया गया, संपूर्ण सिस्टम के रूप में नहीं।

STP बने पर घर नहीं जुड़े, 21 संयंत्र प्रतीकात्मक बनकर रह गए
कैग रिपोर्ट के मुताबिक, स्टेट गंगा कमिटी और SMCG ने सीवरेज परियोजनाओं की योजना बनाते समय तीन बुनियादी घटकों – STP, इंटरसेप्शन डायवर्जन (I&D) और घरों को सीवर नेटवर्क से जोड़ने – को एक साथ नहीं सोचा। फोकस केवल नालों को पकड़ कर STP तक ले जाने पर रहा, घरों के कनेक्शन पर नहीं।
ऑडिट में सामने आया कि सात गंगा तटीय कस्बों में बने 21 STP किसी भी घर से कनेक्ट नहीं हैं और केवल ‘ग्रे वॉटर’ (रसोई व नालियों का पानी) ट्रीट कर रहे हैं, असली सीवेज नहीं। जोशीमठ, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कीर्तिनगर, श्रीनगर, श्रीकोट और जोशीमठ जैसे कस्बों में महंगी योजनाएँ बनीं, नाले टैप हुए, STP बने, लेकिन घरों तक पाइपलाइन ही नहीं बिछाई गई।
जोशीमठ के केस स्टडी में दिखाया गया कि 2010 और फिर 2017 की दो योजनाओं पर कुल 42.73 करोड़ रुपये खर्च हुए – पहले 27.67 किमी सीवर लाइन, फिर 1.08 और 2.70 MLD के दो STP – लेकिन एक भी घर इन लाइनों और STP से नहीं जुड़ा। बाद में जब भू धंसाव की घटनाएँ सुर्खियों में आईं और कारणों में खराब सीवरेज व्यवस्था को भी माना गया, तब 2023 में 202 करोड़ की नई योजना के लिए DPR बनाने की बात शुरू हुई, वो भी आपदा राहत पैकेज के तहत।

2020 तक ‘नो अनट्रीटेड सीवेज’ का लक्ष्य अधूरा
नमामि गंगे के तहत 2020 तक गंगा में कोई भी अनट्रीटेड सीवेज न गिरने देने का लक्ष्य रखा गया था। कैग ने पाया कि योजनाबद्ध तरीके से घरों को कनेक्ट न करने और अधूरी नदी बेसिन योजनाओं के कारण यह लक्ष्य हासिल नहीं हो सका और कई गंगा तटीय कस्बों से अब भी कच्चा सीवेज सीधे नदी में जा रहा है।

क्षमता कम आँकी, Haridwar–Rishikesh के STP शुरू होते ही ओवरफ्लो
रिपोर्ट में कई मामलों में STP की डिजाइन क्षमता कम आँकने के उदाहरण दिए गए हैं।

• जगजीतपुर, हरिद्वार (68 MLD STP):
2014 में नई STP क्षमता 40 MLD प्रस्तावित की गई, बाद में उसे बढ़ाकर 68 MLD कर दिया गया और दावा किया गया कि यह 2028 तक की जरूरत के लिए पर्याप्त होगी। लेकिन मार्च 2023 में यह संयंत्र औसतन 71 MLD और अधिकतम 84 MLD सीवेज प्राप्त कर रहा था, यानी 2028 का अनुमान 2023 में ही पार हो गया।
• ढालवाला, ऋषिकेश (7.5 MLD STP):
7.5 MLD की STP 2019 में तैयार हुई, जबकि अनुमानित सीवेज 2018 में ही 7.5 MLD तक पहुँच चुका था। शुरू से ही क्षमता कम पड़ने लगी और नाले का अतिरिक्त गंदा पानी सीधे गंगा में छोड़ा जाता रहा, जो कई महीनों तक मीडिया की रिपोर्टों में भी आया।
• चोरपानी, ऋषिकेश (5 MLD STP):
यहाँ 5 MLD क्षमता 2028 तक के अनुमान पर तय की गई थी, लेकिन 2020 में प्लांट चालू होते ही इनफ्लो क्षमता से ज्यादा हो गया, और 2023 में CPCB ने मौके पर 17 MLD सीवेज पहुँचने की बात दर्ज की। ठेकेदार ने लिखित में माना कि वह केवल 5 MLD ट्रीट कर पा रहा है और बाकी UJN के निर्देश पर बाईपास कर रहा है।
कैग ने साफ कहा है कि DPR बनाते समय घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का डेटा, मौजूदा सीवर नेटवर्क और संभावित जनसंख्या वृद्धि जैसी बुनियादी चीजें ही सही से नहीं आंकी गईं।

कई कस्बों में STP ही नहीं, Gauchar सबसे बड़ा उदाहरण
गौचर जैसे गंगा तटीय कस्बे में 3,930 घर हैं, पर यहाँ एक भी STP नहीं है और लोग पुरानी soak pits व्यवस्था पर निर्भर हैं। सेप्टिक टैंकों की सफाई के लिए कोई वैज्ञानिक प्रबंधन नहीं, जबकि नियमों के मुताबिक हर तीन साल में सेप्टेज को निकालकर किसी STP पर ले जाना जरूरी है।
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सेप्टेज और स्लज मैनेजमेंट: किसानों के खेतों में भारी धातुएँ
2019 में SMCG ने निर्णय लिया कि soak pits से निकलने वाले सेप्टेज को मौजूदा STP के साथ co treatment के जरिए ट्रीट किया जाएगा और हरिद्वार, ऋषिकेश, श्रीनगर और देवप्रयाग में इसके लिए DPR तैयार करने को कहा। NMCG ने जून 2022 में 8.60 करोड़ रुपये की परियोजना को मंजूरी दी, लेकिन UJN बोली की प्रक्रिया से आगे ही नहीं बढ़ सका और कोई co treatment सुविधा आज तक शुरू नहीं हो पाई।
स्लज प्रबंधन में भी गंभीर चूकें सामने आईं। हरिद्वार के तीन STP (जगजीतपुर 27 और 18 MLD, सराय 18 MLD) से 64,292 घन मीटर स्लज निकला, जिसमें से 51,071 घन मीटर किसानों को खाद के रूप में मुफ्त बाँटा गया, जबकि शोधों और लैब रिपोर्टों में इनमें भारी धातुओं की अधिक मात्रा पाई गई, जो मिट्टी और फसलों के लिए हानिकारक है।
जगजीतपुर में 4.40 करोड़ की लागत (कुल 4.93 करोड़ GST सहित) से स्लज मैनेजमेंट प्लांट बना, पर डिज़ाइन के समय स्लज की calorific value मानी ही नहीं गई। बाद में पता चला कि calorific value अपेक्षित से कम (लगभग 2,469 cal/g) है, इसलिए अतिरिक्त LPG जलाए बिना प्लांट चल ही नहीं सकता, जो आर्थिक रूप से अलाभकारी है; नतीजतन प्लांट चालू होने के बाद भी व्यावहारिक रूप से बंद पड़ा है।
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सुरक्षा ऑडिट शून्य, दो बड़े हादसे – CAG ने कड़ी टिप्पणी की
NMCG के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद उत्तराखंड में STP और अन्य नमामि गंगे परिसंपत्तियों की Ganga Safety Audit या सुरक्षा ऑडिट कभी नहीं कराई गई। कैग ने बताया कि सुरक्षा ऑडिट न होने की स्थिति में दो बड़े हादसे हुए – एक में जानमाल का नुकसान हुआ, दूसरे में परिसंपत्तियों को भारी क्षति पहुँची, जिनका सीधा संबंध सुरक्षा मानकों की अनदेखी से था।
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घाट श्मशान पर ताला, अंतिम संस्कार अब भी नदी किनारे
ऑडिट में 11 नए निर्मित शवदाह गृहों का संयुक्त निरीक्षण किया गया – चमोली, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग, टिहरी, गौचर और उत्तरकाशी क्षेत्र के कई स्थानों पर – और पाया गया कि स्थानीय लोगों ने कहीं भी औपचारिक मांग नहीं की थी। लगभग सभी जगह चिताएँ अब भी नदी के किनारे या नदी तल में ही जलाई जाती हैं, जबकि आधुनिक श्मशान या तो बंद पड़े हैं या जर्जर अवस्था में हैं।
स्थानीय निकायों को इन श्मशान घाटों का रख रखाव सौंपा गया था, लेकिन अधिकांश जगह न सफाई है, न उपकरण काम कर रहे हैं, न ही कोई रजिस्टर या उपयोग का रिकॉर्ड। कैग ने इसे “योजना बनाते समय सामाजिक सांस्कृतिक प्राथमिकताओं और सार्वजनिक मांग की अनदेखी” बताया।

ठोस कचरा प्रबंधन: ढलानों पर डंपिंग, आग लगाकर निपटान
UKPCB के रिकॉर्ड के अनुसार 2022 23 में राज्य के 102 नगर निकायों में से 44 प्रतिदिन पाँच टन या उससे अधिक ठोस कचरा पैदा कर रहे थे, लेकिन किसी के पास भी प्रोसेसिंग और डिस्पोज़ल सुविधाओं के लिए स्वीकृत प्राधिकरण (authorisation) नहीं था। 2017 18 से 2022 23 तक या तो आवेदन ही नहीं आए या आए तो UKPCB ने अधिकांश को “मानकों के अनुरूप न होने” की वजह से खारिज कर दिया, पर इस दौरान भी डंपिंग साइटें चालू रहीं।
ऑडिट टीम ने पाया कि अधिकतर गंगा तटीय शहरों में कचरा सीधे नदी की ढलानों पर फेंका जाता है या जला दिया जाता है, जिससे राख और प्लास्टिक कण बारिश में बहकर गंगा में चले जाते हैं। कैग ने टिप्पणी की कि सात साल बाद भी SWM Rules, 2016 की गंभीर अवहेलना हो रही है और न राज्य गंगा समिति न जिला समितियाँ इस पर सख्ती दिखा पाईं।

जल गुणवत्ता: देवप्रयाग से हरिद्वार तक 32 गुना बढ़ा कोलीफॉर्म
कैग ने हर की पौड़ी (हरिद्वार) और देवप्रयाग के बीच लगभग 10 साल के Total Coliform डेटा की तुलना की। रिपोर्ट के अनुसार 93 किमी के इस हिस्से में अक्टूबर 2023 तक टोटल कोलीफॉर्म स्तर देवप्रयाग की तुलना में हरिद्वार पर 32 गुना तक बढ़ा पाया गया, जबकि DO और BOD जैसे अन्य मानक अपेक्षाकृत बेहतर हैं।
CPCB और UKPCB की संयुक्त रिपोर्टों के आधार पर यह भी सामने आया कि 44 STP में से अधिकांश NGT और MoEF&CC दोनों के मानकों पर खरे नहीं उतर रहे – 2023 की तीन तिमाहियों में हर बार अधिकतर STP गैर अनुपालन की श्रेणी में रहे। आठ STP तो चार साल से अधिक समय से UKPCB की वैध स्वीकृति (Consent to Operate) के बिना ही चल रहे थे।

लैब की विश्वसनीयता पर भी सवाल
UKPCB को NMCG से लैब उन्नयन के लिए जो धन मिला, उसका केवल 34 फीसदी (लगभग 5.55 करोड़) ही पाँच साल में खर्च हो सका, और समय पर किसी भी लैब की NABL मान्यता नहीं ली जा सकी। 2023 में केंद्रीय लैब के लिए NABL आवेदन किया गया, लेकिन ऑडिट के समय तक इसे मान्यता नहीं मिली थी, जबकि उसी अवधि में CPCB के टेस्ट नतीजों और UKPCB के नतीजों में भारी अंतर दर्ज किया गया। कैग के अनुसार, इससे राज्य स्तर पर निगरानी की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिह्न लग जाता है।

सरकार की सफाई और CAG की सख्त सिफारिशें
राज्य सरकार ने कई बिंदुओं पर जवाब देते हुए कहा कि संसाधन सीमित हैं, इसलिए अपने संसाधनों से हर घर को सीवर से जोड़ना तुरंत संभव नहीं था और KfW जैसे बाहरी वित्त पोषण वाले प्रोजेक्ट के ज़रिए हरिद्वार ऋषिकेश में 100 प्रतिशत कवरेज की दिशा में काम जारी है। पर CAG ने साफ कहा कि नमामि गंगे को केवल “ड्रेन कैचिंग प्रोजेक्ट” बनाकर रखना, बिना घर कनेक्शन और पूरी योजना के, सार्वजनिक धन की बर्बादी जैसा है।
रिपोर्ट ने अनुशंसा की है कि:
• उत्तराखंड सरकार सभी STP की व्यापक सुरक्षा ऑडिट कराए और खामियाँ दूर होने के बाद ही उन्हें मेंटेनेंस एजेंसियों को सौंपे।
• राज्य गंगा समिति और SMCG तत्काल राज्य एवं जिला स्तर नदी बेसिन प्रबंधन योजनाएँ तैयार कर सीवरेज, ठोस कचरा, स्लज और सेप्टेज को एक समेकित ढाँचे में संबोधित करें।
• STP, I&D और घरों के कनेक्शन तीनों को एक साथ योजना का हिस्सा बनाया जाए, ताकि “प्रतीकात्मक” प्लांटों की जगह वास्तव में गंदा पानी गंगा तक पहुँचने से पहले ही रोका जा सके।
कैग की यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि भारी बजट और बड़ी घोषणाओं के बावजूद, उत्तराखंड में नमामि गंगे ज़मीन पर अपने इरादों के अनुरूप परिणाम नहीं दे पा रही है – और गंगा की असली सफाई अब भी योजनाओं से ज़्यादा राजनीतिक इच्छाशक्ति, स्थानीय भागीदारी और तकनीकी दक्षता पर निर्भर है।

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