उत्तराखंड की लगभग सात हजार बीघा सरकारी जमीन नीलामी को तैयार है। अरबों रुपये, कई सौ करोड़ की बेशकीमती सरकारी जमीन की बोली लग रही है। उत्तराखंड के लगभग हर जिले की सरकारी जमीन या तो नीलामी में जा रही है या उसके लिए तैयारी पूरी कर ली गई है।

पहाड़ों की बेशकीमती सरकारी जमीनों की नीलामी का मॉडल खडा किया है उत्तराखण्ड के चर्चित आई ए एस अफसर आर मीनाक्षी सुंदरम और मोहर लगाई है हमारे ‘धाकड़’ मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने । मुख्यमंत्री धामी ने अपने हस्ताक्षरों से हजारों बीघा सरकारी जमीन को निजी कंपनियों को नीलाम करने का रास्ता खोल दिया है।

और इन जमीनों पर निजी कंपनियां रिसॉर्ट, वेलनेस सेंटर, फाइव स्टार होटल, पांच सितारा टाउनशिप, आलीशान प्राइवेट स्कूल और हॉस्टल बना सकती हैं।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि सरकारी जमीन का इस्तेमाल होगा या नहीं।
बड़ा सवाल यह है कि यह जमीन किस कीमत पर, कितने लंबे समय के लिए और किन शर्तों पर निजी हाथों में जाएगी?
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ये हैं वे बेशकीमती सरकारी जमीनें
टिहरी
• धनौल्टी में उद्यान विभाग की 3.40 हेक्टेयर जमीन
• धनौल्टी में ही उद्यान विभाग के पोटैटो प्रोजेक्ट की 7.85 हेक्टेयर जमीन
पौड़ी गढ़वाल
• खिर्सू में उद्यान विभाग के ब्रीडिंग गार्डन की 2.80 हेक्टेयर जमीन
देहरादून
• चकराता के नगऊ में 2.88 हेक्टेयर जमीन
• माजरी ग्रांट में उद्यान विभाग की 9.5 एकड़ जमीन
• डाकपत्थर की 180 एकड़ जमीन
ऋषिकेश
• IDPL की 633 एकड़ भूमि
उत्तरकाशी
• राजकीय उद्यान रेथल
• राजकीय उद्यान हर्षिल
अल्मोड़ा
• चौबटिया की 5.91 हेक्टेयर जमीन
• राजकीय उद्यान दूनागिरी
• मरचूला
नैनीताल
• कृषि विभाग की पटुवाडांगर में 23 एकड़ जमीन
• HMT रानीबाग की 53 एकड़ जमीन
• रामगढ़ में राजकीय उद्यान विभाग की 15 एकड़ जमीन
• भवाली के TB सेनेटोरियम की बेशकीमती जमीन
• रामनगर में कॉर्बेट नेशनल पार्क के बेहद नजदीक पाटकोट और मरचूला की कुल 65.5 एकड़ जमीन
हरिद्वार
• सलेमपुर महमूद की 21 एकड़ भूमि
• लालढांग की भूमि
पिथौरागढ़
• मैग्नेसाइट एंड मिनरल्स लिमिटेड की साइट
• कनालीछीना की वन पंचायत भूमि
• हरि सिंह थापा स्पोर्ट्स कॉलेज की भूमि का हिस्सा, रिसॉर्ट बनाने के लिए
ऊधमसिंह नगर
• किच्छा का पराग फार्म में फाईव स्टार टाउनशिप
यानी मामला किसी एक जिले या किसी एक विभाग तक सीमित नहीं है।
उत्तराखंड के लगभग हर हिस्से में सरकारी जमीन को निजी निवेश के लिए इस्तेमाल किया जा चुका है या फिर उसकी तैयारी हो रही है।

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आखिर यह खेल कौन खेल रहा है?
अब हम आपको बताते हैं कि उत्तराखंड की बेशकीमती सरकारी जमीनों की नीलामी का यह पूरा मॉडल कौन चला रहा है।
इसके पीछे है UIIDB — Uttarakhand Investment and Infrastructure Development Board।
नियोजन विभाग के अंर्तगत आने वाले इस बोर्ड के के अध्यक्ष खुद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी है और इसके एम डी है आर मीनाक्षी सुंदरम ।
अलग-अलग सरकारी विभागों की बेशकीमती जमीनों का इष्टतम उपयोग यानी Optimum Use करने के नाम पर इन जमीनों को निजी निवेशकों के लिए उपलब्ध कराया जा रहा है।
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2023 में बना UIIDB
नियोजन विभाग के अंतर्गत आने वाले UIIDB का गठन वर्ष 2023 में धामी सरकार ने किया।
इस बोर्ड का उद्देश्य था PPP मॉडल पर निजी निवेशकों को उत्तराखंड में लाना।
दिसंबर 2023 में होने वाले Global Investors Summit से ठीक पहले सितंबर में एक्ट लाकर इस बोर्ड का गठन किया गया।
अलग-अलग मीडिया रिपोर्टों में इन्वेस्टर समिट में हुए निवेश के आंकड़ों और जमीन पर हुए वास्तविक निवेश को लेकर सवाल उठाए गए।
इसके बाद सरकारी जमीनों को निवेश के लिए इस्तेमाल करने का रास्ता तेजी से आगे बढ़ा।
और इसी कड़ी में 24 फरवरी 2025 को नियोजन सचिव मीनाक्षी सुंदरम ने सभी जिलाधिकारियों को पत्र लिखा।
इस पत्र में निजी कंपनियों के निवेश के लिए खास तौर पर हॉस्पिटैलिटी सेक्टर और प्राइवेट आवासीय स्कूलों के लिए जमीन चिन्हित उसका ब्यौरा उपल्बध करने को कहा गया।

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जमीनें दूसरे विभागों की थीं, फिर UIIDB तक कैसे पहुंचीं?
इनमें से ज्यादातर जमीनें अलग-अलग सरकारी विभागों के नाम थीं।
ऐसे में इन्हें UIIDB तक लाने के लिए एक प्रक्रिया बनाई गई।
इसके लिए एक अनुशंसा समिति बनाई गई।
इस समिति के अध्यक्ष मुख्य सचिव है।
इसके अलावा आठ अलग-अलग विभागों के सचिव इसके सदस्य थे।
समिति के सदस्य सचिव है सचिव नियोजन मीनाक्षी सुंदरम, जो UIIDB के MD भी हैं।
इस समिति को जिलाधिकारी खाली पड़ी सरकारी जमीनों के प्रस्ताव भेजते हैं।
फिर समिति यह तय करने की अनुशंसा करती है कि उस सरकारी संपत्ति का उपयोग किस तरह किया जाए।
इसके बाद प्रस्ताव मुख्यमंत्री के पास जाता है।
मुख्यमंत्री के हस्ताक्षर के बाद ही इन संपत्तियों को लीज पर देने की अनुमति मिलती है।
इस अनुशंसा समीति के गठन का प्रस्ताव नवंबर 2022 में मसूरी में हुई कैबिनेट बैठक में पास हुआ था।

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फिर शुरू हुआ सरकारी जमीनों को UIIDB में लाने का सिलसिला
इसके बाद अनुशंसा समिति ने अलग-अलग सरकारी विभागों की जमीनों को उनके मूल विभाग से UIIDB में ट्रांसफर करने की संस्तुति करनी शुरू की।
ऐसी ही एक बैठक 2 जनवरी 2025 को हुई।
इसमें कृषि और उद्यान विभाग की जमीनों को UIIDB को हस्तांतरित करने की संस्तुति की गई।
इसमें शामिल थीं—
• नैनीताल की पटुवाडांगर की 23 एकड़ जमीन — प्रीमियम रिजॉर्ट के लिए
• चकराता के नगऊ में उद्यान विभाग की 2.88 हेक्टेयर जमीन — पैराग्लाइडिंग और एम्यूजमेंट एक्टिविटी के लिए
• धनौल्टी में उद्यान विभाग की आलू पट्टी की एक हेक्टेयर जमीन — तीन सितारा होटल के लिए
• टिहरी के मागरा में फल पट्टी की 30 हेक्टेयर जमीन — थीम पार्क, वेलनेस सेंटर और रिसॉर्ट के लिए
यह प्रस्ताव मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के पास गया।
और 14 जनवरी 2025 को मुख्यमंत्री धामी ने इस पर अंतिम अनुमति दे दी।

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फिर 28 अगस्त 2025 को एक और बड़ी बैठक
अनुशंसा समिति की एक और बैठक 28 अगस्त 2025 को हुई।
इसमें कई और बड़ी सरकारी जमीनों को UIIDB के जरिए निजी निवेश के लिए इस्तेमाल करने की संस्तुति की गई।
इसमें शामिल थीं—
• देहरादून के माजरी ग्रांट की 9 एकड़ जमीन — उद्यान विभाग से SIDCUL को
• हरिद्वार के सलेमपुर महमूद की 21 एकड़ जमीन — राजस्व विभाग से SIDCUL को
• रामनगर के पाटकोट की 37 एकड़ जमीन — राजस्व विभाग से SIDCUL को
• मरचूला की 28 एकड़ जमीन
• HMT रानीबाग की 53 एकड़ जमीन — UIIDB को
• देहरादून के डाकपत्थर की 180 एकड़ जमीन — UIIDB को, टाउनशिप, रिसॉर्ट और होटल के लिए
• IDPL ऋषिकेश की 633 एकड़ जमीन — पर्यटन विकास बोर्ड से UIIDB को, हॉस्पिटैलिटी सेक्टर से जुड़े कामों के लिए
इस पर अक्टूबर 2025 में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हस्ताक्षर कर लीज की अनुमति दे दी।

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लेकिन असली सवाल यहां से शुरू होता है
सरकारी विभागों की जमीनों को UIIDB में ट्रांसफर करने की यह प्रक्रिया आपको सामान्य सरकारी कामकाज लग सकती है।
लेकिन यहीं असली सवाल है।
दरअसल, 12.50 एकड़ से ज्यादा सरकारी भूमि को एक विभाग से दूसरे विभाग में ट्रांसफर करने और उसे लीज पर देने का अधिकार कैबिनेट यानी राज्य के मंत्रीमण्डल को है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या कैबिनेट के अधिकारों को अनुशंसा समिति और मुख्यमंत्री के जरिए इस्तेमाल किया गया?
यानी जो काम सामान्य तौर पर कैबिनेट स्तर पर होना चाहिए, क्या उसके लिए एक अलग व्यवस्था खड़ी कर दी गई?
जो निर्णय मंत्रीमण्डल को करना था उसका पूरा अधिकार मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने पास रख लिया।

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दूसरा बड़ा सवाल — UIIDB को जमीन मुफ्त में क्यों?
यहां कहानी और गंभीर हो जाती है।
इन जमीनों को मूल सरकारी विभाग जिनकी ये जमिन थी , से UIIDB को बिना किसी शुल्क के ट्रांसफर किया गया।
जबकि जमीन के विभागीय हस्तांतरण से जुड़े वर्ष 2020 के सरकारी आदेश में जमीन के हस्तांतरण के लिए जनहित और मूल्य निर्धारण से जुड़े प्रावधान हैं।
साल 2020 के एक सरकारी आदेश के अनुसार इस आदेश में तीन बातें खास हैं—
पहला
किसी भी विभाग से दूसरे विभाग को जमीन हस्तांतरित होती है तो उसका आधार जनहित होना चाहिए।
सवाल है—
क्या निजी कंपनियों के लिए रिसॉर्ट, होटल और टाउनशिप बनाने को जमीन देना जनहित की उसी कसौटी पर आता है?
दूसरा
यदि जमीन जनहित में एक विभाग से दूसरे विभाग को दी जा रही है, तभी वह निशुल्क हो सकती है।
लेकिन UIIDB का इस्तेमाल निजी निवेश और व्यावसायिक परियोजनाओं के लिए हो रहा है।
तो सवाल है—
क्या UIIDB को जमीन निशुल्क क्यों मिली ?
तीसरा
UIIDB के पत्राचार में यह आपत्ति भी उठाई गई कि जिस विभाग की जमीन पर योजना—यानी रिसॉर्ट, होटल आदि—बनाए जाने हैं, उसकी अनुमति लेना जरूरी है।
14 जुलाई 2025 को UIIDB के एक कर्मचारी ने अपनी नोटिंग में यह सवाल उठाया।
लेकिन इसके बाद इस नियम को विलोपत (हटाकर) कर आगे बढ़ने के आदेश दिए गए।
इस नियम को हटाने का अनुमोदन खुद प्रमुख सचिव मीनाक्षी सुंदरम ने किया।
यहां जांच का सवाल बेहद सीधा है—
अगर मूल विभाग की अनुमति जरूरी थी, तो उसे हटाने की जरूरत क्यों पड़ी?
और क्या इस शर्त के बने रहने पर मूल विभाग इन जमीनों पर आपत्ति कर सकता था?
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अब समझिए UIIDB जमीन मिलने के बाद करता क्या है
UIIDB इन जमीनों को 90 साल की लीज पर निजी निवेशकों को दे सकता है।
यानी सरकार जमीन बेच नहीं रही है, लेकिन बेहद लंबी अवधि के लिए उसका इस्तेमाल निजी हाथों में दे रही है।
और यहीं से दूसरा बड़ा सवाल शुरू होता है—
90 साल की इस लीज की कीमत कितनी है?
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नैनीताल का पटुवाडांगर — पूरी कहानी का सबसे बड़ा उदाहरण
इसी साल जुलाई में नैनीताल के पटुवाडांगर की लगभग 13 एकड़ जमीन को 90 साल की लीज पर देने के लिए टेंडर निकाला गया।
टेंडर लगभग ₹38 करोड़ का है।
और इसमें सालाना लीज रेंट लगभग ₹2 लाख है।
आकलन करने पर जमीन की कीमत करीब ₹2.5 करोड़ प्रति एकड़ बैठती है।
लेकिन अभी कहानी खत्म नहीं हुई।
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सरकार खुद सड़क बना रही है
इसी साल जनवरी में UIIDB ने इस जमीन तक पहुंचने के लिए करीब एक किलोमीटर सड़क बनाने का टेंडर भी निकाला।
यानी जिस जमीन पर निजी कंपनी निवेश करेगी, वहां तक पहुंच आसान बनाने के लिए जनता के धन से सड़क बनाई जा रही है।
सड़क पहुंचने के बाद जमीन की commercial value बढ़ जाती है ये एक सामान्य बुद्धी वाला व्यक्ति आसानी से समझ सकता है।
और पटुवाडांगर में कुमाऊं विश्वविद्यालय का मेरु इंस्टीट्यूट भी बन रहा है।
इससे इलाके की commercial potential और बढ़ जाता है।
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फिर बाजार भाव क्या है?
जब पटुवाडांगर के पास पापड़ी गांव में जमीन का बाजार मूल्य पता किया गया तो वहां करीब ₹4 करोड़ प्रति एकड़ का भाव बताया गया।
अगर इसी बाजार दर को आधार मानें तो 13.64 एकड़ जमीन की कीमत करीब ₹54 करोड़ बैठती है।
जबकि UIIDB का टेंडर लगभग ₹38 करोड़ का है।
यानी करीब ₹16 करोड़ का अंतर दिखाई देता है।
अगर आसपास जमीन ₹4 करोड़ प्रति एकड़ के हिसाब से बिक रही है, तो सरकारी जमीन की कीमत करीब ₹2.5 करोड़ प्रति एकड़ कैसे तय हुई? जबकि यू आई आई डी बी यहाँ खुद सडक पहुँचा रहा है ।
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और यहां एक और सवाल — निवेशक कौन हो सकता है?
UIIDB के टेंडर में पात्रता की शर्तें ऐसी हैं कि आम स्थानीय कारोबारी के लिए इसमें भाग लेना बेहद मुश्किल दिखाई देता है।
कंपनी का पिछले तीन वित्तीय वर्षों में औसत वार्षिक टर्नओवर कम से कम ₹500 करोड़ होना चाहिए।
नेटवर्थ कम से कम ₹60 करोड़ होनी चाहिए।
इसके अलावा पिछले 10 वर्षों में प्रीमियम हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र में कम से कम 1,000 कमरे यानी keys संचालित करने का अनुभव होना चाहिए।
और कंपनी की 25 से अधिक देशों में मौजूदगी होनी चाहिए।
अगर कंपनी के पास खुद यह अनुभव नहीं है तो वह किसी अंतरराष्ट्रीय 5-स्टार ब्रांड का Support Letter लगा सकती है।
यानी सवाल है—
क्या यह नीति उत्तराखंड के स्थानीय निवेशक के लिए है या बड़े राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के लिए?
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अब सबसे बड़ा सवाल — जमीन की कीमत तय कैसे होती है?
इसके लिए UIIDB ने अपनी Land Allocation Guideline बनाई है।
यही गाइडलाइन बताती है कि सरकारी जमीन को निजी कंपनी को लीज पर किस कीमत और किन शर्तों पर दिया जाएगा।
और यहीं से कहानी का सबसे अहम हिस्सा शुरू होता है।
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पहला सवाल — टेंडर की जानकारी कितने लोगों तक पहुंचेगी?
गाइडलाइन में कहा गया है कि टेंडर राज्य के सरकारी पोर्टल पर डाला जाएगा।
इसके अलावा UIIDB जिस दूसरे प्लेटफॉर्म को तय करेगा, वहां भी इसे प्रकाशित किया जा सकता है।
सवाल यह है कि अगर राज्य में प्रचलित व्यवस्था ज्यादा व्यापक प्रचार की मांग करती है, जिसमें वो कहती हा कि दो राष्ट्रीय अखबारों में टेंडर नोटिस छपना चाहिए । तो क्या केवल पोर्टल और चुने हुए प्लेटफॉर्म से उतनी ही व्यापक प्रतिस्पर्धा पैदा होगी?
जितने ज्यादा bidder, उतनी ज्यादा competition और उतनी बेहतर price discovery।
अगर bidder कम हुए तो सरकारी जमीन की कीमत भी कम मिलने का खतरा है।
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दूसरा सवाल — 90 साल की लीज
गाइडलाइन के अनुसार जमीन 90 साल की लीज पर दी जा सकती है।
90 साल यानी लगभग तीन पीढ़ियों तक जमीन का इस्तेमाल निजी कंपनी के पास रहेगा।
एक तरफ मुख्यमंत्री अपने भाषणों में मजबूत भू-कानून लागू करने के लिए अपनी ही पीठ थपथपाते रहते हैं ।
वहीं खुद वो सरकारी जमीनों को 90 साल की लिज पर देकर पहाडों की जमीनों को बाहरी कंपनियों के सूपुर्द करने का चोर दरवाजा खोल रहे हैं ।
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तीसरा सवाल — Sub-Lease
गाइडलाइन में sub-lease का प्रावधान भी महत्वपूर्ण है।
अगर मूल allottee आगे किसी तीसरे पक्ष को जमीन का अधिकार दे सकता है तो सवाल है—
सरकारी जमीन पर पैदा होने वाले इस अतिरिक्त लाभ में सरकार का हिस्सा क्या होगा?
अगर किसी निवेशक को कम कीमत पर lease मिली और उसने बाद में उसी अधिकार को ज्यादा कीमत पर किसी तीसरे पक्ष को दे दिया तो उस अतिरिक्त कमाई का लाभ किसे मिलेगा?
अगर इस बात को हम यूँ समझे की एक बिल्डर अपने ग्राहकों को लीज ली हुई जमीन पर फ्लैट बना कर बेच सकता है । साफ तौर पर ये मामला डैमोग्राफिक चेंज से जुडता है।
क्या इसके लिए UIIDB की पूर्व अनुमति जरूरी है?
गाइडलाइन इस सवाल पर स्पष्ट नहीं दिखाई देती।
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चौथा सवाल — जमीन गिरवी रखकर लोन
90 साल की lease पर दी गई जमीन पर निजी investor बैंक से loan भी ले सकता है।
यानी—
सरकार से जमीन लीज पर लो, उसे mortgage करो और उसके आधार पर पैसा जुटाकर project खड़ा करो।
यहां सवाल यह है कि जमीन की मूल कीमत, leasehold right और उस पर बनने वाली वित्तीय क्षमता का फायदा आखिर किसे मिलता है?
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पांचवां सवाल — भुगतान भी तुरंत पूरा नहीं
गाइडलाइन में भुगतान की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है।
निवेशक को कुल lease payment का 25 प्रतिशत 30 दिनों के भीतर देना है।
बाकी 75 प्रतिशत अगले 10 साल में दिया जा सकता है।
यानी investor को 90 साल का lease right मिल जाता है, लेकिन पूरी रकम तुरंत सरकार के पास नहीं आती।
यहां सवाल है—
क्या सरकार को इतनी लंबी lease के लिए इतनी लंबी payment window देना आर्थिक रूप से उचित है?
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और सबसे बड़ा सवाल — Freehold
गाइडलाइन में leasehold जमीन को भविष्य में freehold करने की संभावना भी रखी गई है।
Freehold का मतलब है कि leasehold अधिकार को आगे चलकर मालिकाना हक में बदला जा सकता है।
यानी आज जमीन lease पर है।
कल वह freehold हो सकती है।
और तब सवाल और बड़ा हो जाता है—
सरकार उस समय जमीन की नई बाजार कीमत के हिसाब से कितना पैसा लेगी?
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अब आते हैं Lease Premium पर
एक और बड़ा सवाल है।
गाइडलाइन में जमीन की कीमत तय करने के अलग-अलग तरीके रखे गए हैं।
पहला तरीका
जिस कीमत पर सरकारी विभाग से जमीन UIIDB को ट्रांसफर की गई हो, उसे आधार बनाया जा सकता है।
लेकिन यहां सवाल है कि जब जमीन UIIDB को बिना शुल्क ट्रांसफर की गई, तो उस स्थिति में जमीन की वास्तविक कीमत कैसे तय होगी?
दूसरा तरीका
जमीन ट्रांसफर के समय उस इलाके की कृषि भूमि का Circle Rate आधार बनाया जा सकता है।
अब सोचिए—
सरकारी जमीन पर रिसॉर्ट, होटल या दूसरी commercial activity होने वाली है।
लेकिन मूल्यांकन के लिए कृषि भूमि का Circle Rate लिया जाए तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
अगर कोई सामान्य व्यक्ति अपनी कृषि भूमि पर घर बनाना चाहता है और land use बदलता है तो residential या commercial उपयोग के लिए अलग मूल्य लागू होता है।
फिर सवाल यह है—
होटल और रिसॉर्ट बनाने के लिए सरकारी जमीन की कीमत कृषि Circle Rate से क्यों तय की जाए? इसलिए कि सर्किल रेट बाजार मूल्य से कम होता है । और इसका फायदा निजी निवेशक को होगा ?
तीसरा तरीका
गैर-कृषि भूमि का Circle Rate भी आधार बनाया जा सकता है।
लेकिन यहां भी सवाल वही है—
Circle Rate या वास्तविक Market Rate?
क्योंकि वर्ष 2020 के सरकारी आदेश के अनुसार निजी व्यक्ति को सरकारी जमीन देने के मामलों में न्यूनतम बाजार मूल्य पर ही किसी निजी कंपनी या व्यक्ति को सरकारी जमीन मिल सकती है और वो भी जनहित के लिए ।
और चौथा हिस्सा
इस कीमत में UIIDB का 10 प्रतिशत margin भी शामिल है।
लेकिन सवाल है—
10 प्रतिशत ही क्यों?
10 प्रतिशत तय करने का formula क्या है?
10 प्रतिशत से ज्यादा क्यों नहीं?
कम क्यों नहीं?
और यह राशि किस लागत या सेवा के बदले ली जा रही है?
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Reserve Price भी बदला जा सकता है
सिर्फ इतना ही नहीं।
Reserve Price यानी जिस कीमत पर भूमी लीज पर दी जा रही है उसके तय होने के बाद भी उसे बदलने की गुंजाइश गाइडलाइन में रखी गई है।
इसका निर्णय UIIDB Board कर सकता है।
यहीं से बड़ा सवाल उठता है—
अगर सरकारी जमीन की कीमत तय करने के बाद उसे बदला जा सकता है, तो उस बदलाव का आधार क्या होगा?
क्या independent valuation होगी?
क्या आसपास की जमीनों की वास्तविक बिक्री देखी जाएगी?
क्या market data सार्वजनिक होगा?
और क्या कीमत घटाने के कारण लिखित रूप में दर्ज होंगे?
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10 प्रतिशत Margin पर भी सवाल
UIIDB के 10 प्रतिशत margin पर भी सवाल जरूरी है।
सरकारी जमीन किसी विभाग की थी।
वह जमीन UIIDB को मिली।
फिर UIIDB उसे निजी निवेशक को lease पर दे रहा है।
तो सवाल है—
UIIDB की भूमिका क्या है और उसके लिए 10 प्रतिशत margin क्यों?
अगर यह administrative cost है तो उसका वास्तविक खर्च कितना है?
अगर यह service charge है तो उसका आधार क्या है?
और अगर यह profit/margin है तो सरकारी जमीन से UIIDB को यह लाभ किस नीति के तहत मिल रहा है?
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क्या दूसरे नियमों को bypass किया गया?
यह भी जांच का बड़ा विषय है।
अगर सरकारी जमीन को निजी व्यक्ति या कंपनी को lease पर देने के लिए राज्य में पहले से नियम मौजूद हैं, तो सवाल है—
क्या UIIDB की नई गाइडलाइन पर ही सवाल उठते हैं ।
और अगर इसमें अलग व्यवस्था बनाई गई है तो क्या इसे वित्त विभाग और न्याय विभाग से इलका निरीक्षण कराया गया?
दस्तावेजों में मार्च 2025 में यह बात सामने आई कि इन गाइडलाइंस पर विभागीय मंत्री यानी मुख्यमंत्री की मंजूरी और वित्त तथा न्याय विभाग की सलाह जरूरी है।
लेकिन नियोजन विभाग के प्रमुख सचिव मीनाक्षी सुंदरम ने इस पर अलग राय रखते हुए कहा कि बोर्ड के पास इसे जारी करने का अधिकार है।
यही वह बिंदु है जहां शंकाऐं जन्म लेती हैं कि ये सारा मॉडल निजी निवेशकों के हित के लिए है ना कि जनहित के लिए ।
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क्या UIIDB ब्रोकर की तरह काम कर रहा है?
अब पूरी तस्वीर को एक साथ रखिए।
जमीन UIIDB की अपनी नहीं है।
वह अलग-अलग सरकारी विभागों की जमीन है।
वह जमीन UIIDB को ट्रां







