प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिसंबर 2023 में उत्तराखंड ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट का उद्घाटन करते हुए राज्य को निवेश का नया हब बताया था। सरकार ने दावा किया कि 3.56 लाख करोड़ रुपये के एमओयू साइन हुए और बाद में कहा गया कि इनमें से 1 लाख करोड़ रुपये का निवेश “ग्राउंड” भी हो चुका है।
लेकिन अब इस दावे पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
न्यूज लॉण्डरी वेबसाईट के पत्रकार बसंत कुमार ने एक खोजी रिपोर्ट में एक बड़ा खुलासा किया है । वेबसाईट के मुताबिक, जिन परियोजनाओं को सरकार ने “ग्राउंडेड इन्वेस्टमेंट” बताया है, उनमें बड़ी संख्या ऐसी है जिनका ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं दिखता। सूची में आटा चक्कियां, खाद-बीज की दुकानें, छोटे क्लीनिक और यहां तक कि सरकारी उपक्रम भी निवेशक के तौर पर शामिल कर दिए गए।
हरिद्वार के किसान नवीन कुमार और नीरज कुमार, जो छोटी आटा चक्कियां चलाते हैं, खुद यह जानकर हैरान रह गए कि सरकारी दस्तावेज़ों में उन्हें निवेशक बताया गया है। दोनों का कहना है कि उन्हें न तो इन्वेस्टर्स समिट की जानकारी थी और न ही उन्होंने किसी ऐसे निवेश का दावा किया।
रिपोर्ट के अनुसार, 1 लाख करोड़ रुपये के कथित ग्राउंडेड निवेश में लगभग 35 हजार करोड़ रुपये का हिस्सा राज्य और केंद्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों से जुड़ा है।टॉप 10 इन्वेस्टर्श में से 8 तो उत्तराखण्ड के सरकारी उपक्रम हैं ।जिसमें उत्तराखण्ड जल विघुत निगम शामिल हैं । जिन पर पहले से सरकारी धन खर्च होता है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या सरकारी खर्च को भी निजी निवेश के रूप में दिखाया जा सकता है?
जानकारों का कहना है कि इन्वेस्टर्स समिट का उद्देश्य निजी पूंजी को आकर्षित करना होता है, न कि सरकार द्वारा अपनी ही कंपनियों को दिए गए प्रोजेक्ट्स को निवेश बताना।
बसंत कुमार अपनी रिपोर्ट में बताते हैं कि हरिद्वार का गोल्फ सिटी प्रौजेक्ट टॉप 10 निवेशकों में है । जो कि दो हजार करोड़ के निवेश का दावा करता है । लेकिन अपनी पडताल में बसंत बताते हैं कि ये प्रोजेक्ट महज 500 करोड का है ।
अपनी इस रिपोर्ट में बसंत बताते है टॉप 10 निवेशक में शामिल एक कंपनी की पडताल करने जब वो उधम सिंह नगर पहुँचे तो ये कंपनी बंद मिलती है । दावा था ये कंपनी 2452 करोड़ का निवेश राज्य में कर रही है।
रिपोर्ट में कई और चौंकाने वाले उदाहरण भी सामने आए हैं।
एक विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के स्कूल को 24.49 करोड़ रुपये का निवेशक दिखाया गया, जबकि संस्था का कहना है कि वह वर्षों से केवल सीएसआर और दान के पैसे से चल रही है।
एक बीज कंपनी के मालिक ने बताया कि उन्होंने करीब 4 करोड़ रुपये खर्च किए, लेकिन सरकारी सूची में उनका निवेश 562 करोड़ रुपये दर्ज है।
कुछ परियोजनाएं ऐसी भी हैं जिन्हें ग्राउंडेड दिखाया गया, जबकि जमीन पर उनका काम शुरू ही नहीं हुआ। कहीं बिजली कनेक्शन नहीं मिला, कहीं पर्यावरणीय मंजूरी नहीं मिली, तो कहीं कंपनी के पास न कर्मचारी थे और न कारोबार।
बसंत कुमार बताते हैं कि उद्योग विभाग का कहना है कि रोजगार और पूंजी निर्माण को देखते हुए सरकारी संस्थाओं और छोटे निवेशकों को भी सूची में शामिल किया गया है। विभाग ने यह भी कहा है कि बाकी तथ्यों की जांच के बाद विस्तृत जवाब दिया जाएगा।
दरअसल जो बात इस पूरे मामले में समझ आती है वो ये है कि जिस किसी ने भी सिंहल विंडो सिस्टम में सरकारी परमिशन लेने के लिए आवेदन किया उसे ग्लोबल इन्वेस्टर बताकर अपनी लिस्ट में शामिल कर लिया गया । औऱ एक लाख करोड़ का टारगेट पूरा करने की कोशिश की गई ।
न्यूज लॉण्ड्री की इस रिपोर्ट में ये दावा किया गया है कि विदेश से तो छोडिए राज्य के बाहर से किसी दूसरे राज्य ने भी उत्तराखण्ड में निवेश नहीं किया ।
इस ग्लोबल समिट को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपनी छवी चमकाने के लिए इस्तमाल किया । इन कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री मोदी औऱ गृह मंत्री अमित शाह भी पहुँचे थे । और सी एम धामी की खूब पीठ थपथपाई । इस कार्यक्रम में लगभग 100 करोड का खर्च हुआ । मुख्यमंत्री धामी ने इसको लेकर विदेशों में रोड शो भी किए । 100 करोड़ खर्च करने के बाद भी प्रदेश के बाहर से कोई निवेश नहीं आया । बल्कि अब एक लाख करोड़ के आंकडे को प्रचार के जरिए सजाया गया । औऱ इस झूठ को सजा कर संवार कर विज्ञापनों के जरिए परोसा गया ।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या उत्तराखंड में निवेश के आंकड़े वास्तविक औद्योगिक निवेश को दिखाते हैं, या फिर सरकारी परियोजनाओं और छोटे कारोबारों को जोड़कर निवेश का आंकड़ा बड़ा बनाया गया है?
यह मुद्दा सिर्फ उत्तराखंड का नहीं, बल्कि उन सभी राज्यों के लिए अहम है जो बड़े-बड़े निवेश सम्मेलनों के जरिए विकास का दावा करते हैं। ऐसे में जरूरी है कि सरकार बताए कि घोषित निवेश में वास्तव में कितना निजी निवेश जमीन पर उतरा और कितना सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा है।
उत्तराखण्ड जैसे छोटे राज्य में 100 कोरड़ रुपय ऐसे आयोजन के लिए फूंक देना जिसका हासिल शून्य है ,कहाँ तक जायज है । धामी सरकार को इस बात का जवाब देना चाहिए कि आखिर एक झूठ को सच बनाने के लिए उसे ऐसे खुर पेंच क्यों करने पडे ।








