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धामी सरकार में ईमानदार अफसरों को सजा, विवादित अफसरों को इनाम? दो फैसलों ने ‘जीरो टॉलरेंस’ की पोल खोल दी!

Panchayat Reporter by Panchayat Reporter
July 3, 2026
in Uttarakhand, उत्तराखंड, देहरादून, बड़ी खबर, राजनीति, स्पेशल
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धामी सरकार में ईमानदार अफसरों को सजा, विवादित अफसरों को इनाम? दो फैसलों ने ‘जीरो टॉलरेंस’ की पोल खोल दी!
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देहरादून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जब भी मंच पर आते हैं तो भ्रष्टाचार के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” की बात जरूर करते हैं। लेकिन क्या धरातल पर उनकी सरकार उसी नीति पर चल रही है? पिछले कुछ दिनों में सरकार के दो फैसलों ने इस दावे पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
एक तरफ एक ऐसे अधिकारी को प्रदेश के सबसे बड़े बिजली निगम का मुखिया बना दिया गया जिसकी नियुक्ति पर पहले ही हाईकोर्ट गंभीर टिप्पणी कर चुका है।जिस पर भ्रष्टाचार के आरोप में वाद कोर्ट में चल रहे हैं । दूसरी तरफ एक वन अधिकारी, जो लगातार अवैध खनन और विभागीय मिलीभगत की शिकायतें करता रहा, उसे निलंबित कर दिया गया।
दोनों मामलों को साथ रखकर देखें तो सवाल उठना लाजिमी है—क्या धामी सरकार में व्यवस्था पर सवाल उठाने वालों की जगह नहीं है?

पी.सी. ध्यानी: कोर्ट ने नियुक्ति पर सवाल उठाए, सरकार ने दे दिया बड़ा पद
सरकार ने पी.सी. ध्यानी को यूपीसीएल का प्रबंध निदेशक नियुक्त कर दिया। यही वह अधिकारी हैं जिनकी पिटकुल के एमडी पद पर नियुक्ति को लेकर मामला हाईकोर्ट पहुंचा था।
याचिका में कहा गया था कि तत्कालीन नियमावली के अनुसार एमडी बनने के लिए बी.टेक. होना अनिवार्य था, जबकि ध्यानी इस पात्रता को पूरा नहीं करते थे। इसी वर्ष फरवरी में हाईकोर्ट ने उनकी नियुक्ति को अवैध बताते हुए सरकार पर कड़ी टिप्पणी की थी और आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए थे।
लेकिन इसके बाद जो हुआ उसने और भी सवाल खड़े कर दिए।
नियम नहीं बदले… पूरी नियमावली ही बदल दी गई!
सरकार ने ऊर्जा निगमों के एमडी पद की पात्रता से जुड़े नियमों में बड़े बदलाव कर दिए।
• बी.टेक. की अनिवार्यता खत्म।
• अधिकतम आयु 58 से बढ़ाकर 60 वर्ष।
• सेवा अवधि 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष।
• पात्रता संबंधी अन्य शर्तों में भी संशोधन।
आरोप है कि यह बदलाव किसी प्रशासनिक सुधार के लिए नहीं बल्कि एक विशेष अधिकारी को लाभ पहुंचाने के लिए किए गए। और ऐसा मानने के प्यार्पत कारण भी हैं ।
सूत्रों का दावा है कि एमडी पद के लिए आवेदन करने वाले अन्य अधिकारियों का इंटरव्यू तक नहीं लिया गया। हालांकि सरकार की ओर से इस पर सार्वजनिक रूप से कोई विस्तृत स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।
इसी अधिकारी के खिलाफ कथित फर्जी हस्ताक्षरों के जरिए पदोन्नति हासिल करने का मामला भी न्यायालय में विचाराधीन है। इसके आलावा बडे स्तर पर वित्तीय गढबढियों का मामला नैनीताल हाई कोर्ट में चल रहा है । तो सवाल ये है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की विशेष अनुकम्मपा इस विवादित अफसर पर क्यों बनी हुई है।

दूसरी तरफ… अवैध खनन रोकने की कोशिश करने वाले अधिकारी पर गिरी गाज
अब बात कालसी वन प्रभाग के एसडीओ राजीव नयन नौटियाल की।
सरकार ने उन्हें निलंबित कर दिया। आधिकारिक कारण बताया गया कि वे वन मंत्री की बैठक में उपस्थित नहीं हुए और अपने प्रोबेशन के दौरान मुकदमों की जानकारी छिपाई।
लेकिन इस कार्रवाई की टाइमिंग पर सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि नौटियाल लंबे समय से विकासनगर क्षेत्र के आसन संरक्षित वन क्षेत्र में कथित अवैध खनन की शिकायतें लगातार कर रहे थे।
उन्होंने डीएफओ, प्रमुख वन संरक्षक, जिलाधिकारी, खनन अधिकारी और एसएसपी तक को पत्र लिखे। उनका आरोप था कि संरक्षित वन क्षेत्र में अवैध खनन हो रहा है और संबंधित विभाग कार्रवाई करने के बजाय आंखें मूंदे बैठे हैं।
उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि आखिर रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्र से खनन विभाग ने खनिज परिवहन की अनुमति किस आधार पर दी गई?
नौटियाल का दावा है कि अवैध खनन रोकने के प्रयास के दौरान उन पर हमला भी हुआ, लेकिन दोषियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिलाधिकारी देहरादून ने उनके आरोपों की जांच के लिए समिति गठित की थी, लेकिन समिति की रिपोर्ट आने का इंतजार किए बिना ही उन्हें निलंबित कर दिया गया।
क्या सरकार पहले जांच का निष्कर्ष जानना नहीं चाहती थी?
नौटियाल ने अपने पत्रों में पुलिस ,जिला प्रशासन,खनन विभाग और अपने खुद के वन विभाग खनन माफिया पर कार्रवाई ना करने के आरोप लगाते रहे लेकिन कुछ नहीं हुआ । उन्होने कार्रवाई की तो डी एफ ओ ने पत्र भेजकर धमकाया कि उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी ।

संयोग या संदेश?

इन दोनों मामलों में एक और समानता है।
ऊर्जा विभाग मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के पास है।
खनन विभाग भी मुख्यमंत्री के पास है।
ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या इन दोनों फैसलों की राजनीतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय पर आती है?

‘जीरो टॉलरेंस’ या ‘सेलेक्टिव टॉलरेंस’?
प्रदेश की जनता अब जवाब चाहती है—
• जिस अधिकारी की नियुक्ति पर अदालत सवाल उठा चुकी थी, उसे दोबारा महत्वपूर्ण जिम्मेदारी क्यों दी गई?
• पात्रता के नियम बदलने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?
• अवैध खनन की शिकायत करने वाले अधिकारी की शिकायतों की निष्पक्ष जांच पहले क्यों नहीं हुई?
• जांच समिति की रिपोर्ट से पहले निलंबन की इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई गई?
जब मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की बात करते हैं, तो इन दोनों मामलों को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब भी सरकार को देना होगा।
क्योंकि लोकतंत्र में केवल भाषण नहीं, फैसले भी सरकार की मंशा बताते हैं।

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