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Home Uttarakhand

क्या कांग्रेस की रणनीतिक चुप्पी भाजपा को दिलाएगी एक और जीत?

Panchayat Reporter by Panchayat Reporter
July 3, 2026
in Uttarakhand, उत्तराखंड, देहरादून, बड़ी खबर, राजनीति, स्पेशल
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क्या कांग्रेस की रणनीतिक चुप्पी भाजपा को दिलाएगी एक और जीत?
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उत्तराखण्ड में क्या भाजपा और कांग्रेस के बाद अब तीसरी ताकतों का उभार हो रहा है? पहाड़ी विधानसभाओं में यूकेडी तीसरे विकल्प के रूप में चर्चाएँ बटोर रही है। वहीं मैदानी विधानसभाओं में बसपा के ह्रास के बाद भीम आर्मी के चंद्रशेखर और निर्दलीय विधायक उमेश शर्मा के साथ आने से दोनों राष्ट्रीय दल भाजपा और कांग्रेस के लिए भारी नुकसान के संकेत दिखाई दे रहे हैं।
हाल ही में निहंग विवाद में यूकेडी के युवा नेता आशीष नेगी के मुखर बयान और आक्रामक शैली ने पहाड़ी वोटरों को अपनी ओर खींचा। सरकारी कार्रवाई को पहाड़ी अस्मिता के विपरीत साबित करने में आशीष नेगी पूरी तरह से सफल रहे। इस मामले में विपक्ष ने जो खालीपन छोड़ा, उसे यूकेडी ने भरने की पूरी कोशिश की और कुछ हद तक उसमें कामयाब भी रही है। यह कोई पहला मौका नहीं है जब यूकेडी किसी मामले में सरकार को घेरने और अपना परसेप्शन बनाने में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को मीलों दूर पछाड़ दिया हो। पेपर लीक मामला हो, या फिर पहाड़ बनाम मैदान बन गए मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल का मुद्दा, या फिर मजबूत भू-कानून की लड़ाई—यूकेडी की स्पष्ट, आक्रामक शैली पहाड़ी वोटरों को अपनी तरफ खींच रही है। जबकि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस इन सभी मामलों में संयमित, नरम और पारंपरिक राजनीतिक रुख अपनाने की वजह से पहाड़ी वोटरों का ध्यान अपनी तरफ नहीं खींच पाई है। यूकेडी इस मामले में पूरी तरह स्पष्ट है कि उसे अपनी राजनीतिक जमीन पहाड़ों में किस तरह तैयार करनी है और वह वहीं पर केंद्रित भी है।
अब इससे इतर बात करते हैं मैदानी जिलों की, जिनमें मुख्यतः देहरादून, हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर प्रमुख हैं। इनमें से भी राजधानी देहरादून को छोड़ दिया जाए तो ऊधम सिंह नगर और हरिद्वार ऐसे जिले हैं, जिनमें कांग्रेस को भाजपा से बढ़त है। हरिद्वार तो ऐसा जिला है, जिसकी ज्यादातर सीटों पर भाजपा कहीं तीसरे नंबर की पार्टी मात्र है। इसका बड़ा कारण जातीगत वोटों का विभाजन है, जिसकी वजह से भाजपा इस जिले में जीत के लिए संघर्ष करती दिखाई देती है । हरिद्वार जिले में 11 विधानसभाएँ हैं, जिनमें से 6 कांग्रेस के पास हैं। 3 पर भाजपा काबिज है, 1 सीट बसपा और 1 निर्दलीय के पास है। मुस्लिम और एससी वोटरों का कॉम्बिनेशन चुनावी जीत को कांग्रेस और बसपा के पक्ष में झुका देता है। उधमसिंह नगर की 9 सीटों में से 5 कांग्रेस के पास हैं और 4 भाजपा के ।
भीम आर्मी के चंद्रशेखर की सक्रियता कांग्रेस के दलित वोट बैंक पर आने वाले चुनावों में बड़ा डेंट मार सकती है। इसके अलावा निर्दलीय विधायक उमेश शर्मा ने अपना समर्थन जन निर्माण पार्टी को दिया है, हालांकि यह पार्टी उनकी पत्नी द्वारा ही बनाई गई है। हरिद्वार की 11 और ऊधम सिंह नगर की 9 सीटों पर चंद्रशेखर और उमेश शर्मा मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं। हाल के दिनों में दोनों नेताओं की एक साथ आई तस्वीरों ने इस संभावना को बढ़ा दिया है । ऐसी स्थिति में त्रिशंकु विधानसभा बनने की संभावना भी बन सकती है और इन दोनों का गठबंधन किंगमेकर साबित हो सकता है।
एक और विकल्प जो तेजी से प्रदेश में उभर रहा है, वह स्वाभिमान मोर्चा है। इसके नेता बॉबी पंवार हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में अपना लोहा टिहरी संसदीय सीट से मनवा चुके हैं। वहीं केदारनाथ उपचुनाव में इस दल के उम्मीदवार त्रिभुवन चौहान ने उम्मीद से ज्यादा वोट झटके, जिससे कांग्रेस को हार का झटका लगा। इस बार के विधानसभा चुनावों में भी इन दोनों चेहरों पर राजनीतिक जानकारों और उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की खास नजर है।
अब सवाल यह उठता है कि दोनों राष्ट्रीय दल भाजपा और कांग्रेस के पास क्या कोई रणनीति है, जो इन क्षेत्रीय ताकतों के बढ़ते प्रभाव से पार पा सके। भाजपा पिछले 10 सालों से सत्ता में है और उसके पास सबसे बड़ा हथियार प्रधानमंत्री मोदी का चेहरा है। उनके चेहरे पर ही भाजपा चुनाव में जाएगी, यह पहले से ही अनुमानित है। हालांकि भाजपा के इस हथियार की धार अब पहले जैसी नहीं रह गई है। लेकिन फिर भी चुनाव लड़ने के लिए संसाधनों का भंडार भाजपा के पास है। विपक्षी दलों से लड़ने के लिए एक मजबूत संगठन और कैडर उसके तरकश के सबसे बड़े तीर हैं, और ऐसा किसी दूसरे दल के पास नहीं है।
अब बात कांग्रेस की करें तो न उसके पास संसाधन हैं और न ही मजबूत संगठन। मोदी के चेहरे के बरक्स राहुल गांधी का चेहरा भी प्रभावी होता दिखाई नहीं दे रहा है। पार्टी के अंदर की गुटबाजी अलग-अलग मंचों पर पार्टी की जगहँसाई कर ही रही है। दिल्ली के नेताओं का रवैया यह बताता है कि राज्य इकाई में उनका कोई खास इंटरेस्ट नहीं है। कार्यकारिणी अभी तक बन नहीं पाई है और वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर ही पार्टी संगठन चल रहा है। इस पर कोढ़ में खाज यह है कि पार्टी उभरते तीसरे विकल्पों से लड़ने की रणनीति बनाना तो छोड़िए, अभी उस दिशा में सोचती हुई भी दिखाई नहीं दे रही है।
राज्य में दस सालों से चल रही भाजपा सरकार के खिलाफ संभावित सत्ता-विरोधी लहर का लाभ लेने से कांग्रेस के वंचित रह जाने के पूरे-पूरे आसार हैं। और यदि ऐसा होता है, तो इसका सीधा फायदा भाजपा को होता हुआ दिखाई दे रहा है।

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