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Home Uttarakhand

नई कैबिनेट का संदेश :धामी मजबूत ,लेकिन दिग्गज गए चूक

Panchayat Reporter by Panchayat Reporter
March 24, 2026
in Uttarakhand, उत्तराखंड, देहरादून, बड़ी खबर, विशेष
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नई कैबिनेट का संदेश :धामी मजबूत ,लेकिन दिग्गज गए चूक
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आखिरकार चुनावी साल में भाजपा सरकार ने खाली पड़े मंत्री पदों पर नामों का ऐलान कर ही दिया। लंबे समय से खाली चल रहे पांच मंत्रियों की कुर्सियों पर पांच नामों का ऐलान होते ही इन चर्चाओं पर भी विराम लग गया है कि क्या पुष्कर सिंह धामी ही भाजपा का चुनावी चेहरा आने वाले 2027 के चुनावों में होंगे।

वहीं विभागों के बंटवारे ने इस बात पर भी मुहर लगा दी है कि पार्टी आलाकमान की तरफ से सीएम धामी को खुली बैटिंग की छूट दे दी गई है। क्योंकि तीन दिग्गज मंत्रियों धन सिंह रावत, सतपाल महाराज और गणेश जोशी के विभागों को जिस तरह से हल्का किया गया है, वह धामी को पार्टी और सरकार में धाकड़ और धुरंधर—दोनों घोषित करने के लिए काफी है।

लेकिन मंत्री पदों की घोषणा के बाद सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की भी हो रही है कि किन चेहरों को मंत्री पद नहीं दिया गया। ऐसा इसलिए क्योंकि जिन पांच लोगों को मंत्री पद दिया गया है, उनमें से तीन कांग्रेसी गोत्र के हैं और अब धामी कैबिनेट में 12 में से 7 मंत्री ऐसे हैं जो कांग्रेस से भाजपा में शामिल होकर विधायक बने और अब मंत्री हैं।

इनमें सतपाल महाराज, सुबोध उनियाल, सौरभ बहुगुणा, रेखा आर्य, राम सिंह कैड़ा, भरत चौधरी और प्रदीप बत्रा शामिल हैं।

नए बने पांच मंत्रियों में से तीन—राम सिंह कैड़ा, भरत चौधरी और प्रदीप बत्रा—कांग्रेस मूल के हैं। राम सिंह कैड़ा नैनीताल जिले की भीमताल सीट से विधायक हैं। भरत चौधरी रुद्रप्रयाग जिले की रुद्रप्रयाग सीट से विधायक हैं और प्रदीप बत्रा हरिद्वार जिले की रुड़की विधानसभा से विधायक हैं।

अब इन तीन जिलों पर नजर दौड़ाएं तो सवाल उठता है कि भाजपा के इन जिलों में वर्षों से संगठन का झंडा उठाने वाले नेताओं से आखिर क्यों नजर फेर ली गई।

नैनीताल जिले की बात करें तो कालाढूंगी सीट से बंशीधर भगत को पार्टी ने मंत्री बनाने लायक नहीं समझा। बंशीधर भगत प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और राज्य सरकार में बतौर मंत्री कई महत्वपूर्ण पद संभाल चुके हैं।

रुद्रप्रयाग और चमोली जिले के कोटे से भरत चौधरी को मंत्री पद दिया गया है, लेकिन इन दोनों जिलों में केदारनाथ और कर्णप्रयाग सीट से दो विधायक मंत्री बनने की पूरी योग्यता रखते थे, जो वर्षों से पार्टी के बड़े नेताओं की रैलियों में भीड़ जुटाते आए हैं।

पहला नाम है केदारनाथ से विधायक आशा नौटियाल का, जो तीसरी बार विधायक हैं। हाल ही में उन्होंने केदारनाथ उपचुनाव जीता और यह जीत मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए राजनीतिक रूप से संजीवनी साबित हुई।

दूसरा नाम है कर्णप्रयाग से तीन बार विधायक रहे अनिल नौटियाल का, जिन्होंने संगठन और सरकार में कई महत्वपूर्ण पद संभाले हैं।

हरिद्वार से कांग्रेस से आए प्रदीप बत्रा को भी शपथ दिलाई गई। इसी जिले से मदन कौशिक को भी शपथ दिलाई गई, लेकिन तीन बार के भाजपा विधायक आदेश चौहान को किनारे कर दिया गया।

मंत्री पद की शपथ लेने वाले भाजपा के दिग्गज नेता मदन कौशिक को शपथ तो दिलाई गई, लेकिन राजनीतिक लिहाज से उनसे कई जूनियर कांग्रेस से आए विधायकों को पहले शपथ दिलाई गई। उनका शपथ लेने का क्रम तीसरा था।

शपथ लेने का क्रम ही कैबिनेट में मंत्रियों की वरिष्ठता तय करता है। जो जिस क्रम में शपथ लेता है, मंत्रीमंडल में उसका कद उसी हिसाब से तय होता है। मदन कौशिक मंत्रीमंडल में नौवें नंबर के मंत्री हैं।

पांच बार के विधायक मदन कौशिक भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और हरिद्वार से विधायक के रूप में अपना पांचवां कार्यकाल पूरा कर रहे हैं। वे उत्तराखंड सरकार के पूर्व प्रवक्ता भी रहे हैं। इससे पहले वे 2007–2012 और 2017–2021 के बीच त्रिवेंद्र सिंह रावत, भुवन चंद्र खंडूरी और रमेश पोखरियाल निशंक के नेतृत्व वाली सरकारों में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं।

इसके अलावा पिथौरागढ़ जिले की डीडीहाट सीट से विधायक बिशन सिंह चुफाल को भी नजरअंदाज किया गया, जो राज्य गठन के बाद से एक भी चुनाव नहीं हारे हैं।

इसी तरह उधम सिंह नगर जिले की गदरपुर सीट से विधायक और पूर्व मंत्री अरविंद पांडे को भी मौका नहीं मिला।

अगर सरसरी तौर पर नजर दौड़ाएं तो देहरादून से विनोद चमोली और सहदेव पुंडीर, टिहरी से विनोद कंडारी और अल्मोड़ा से महेश जीना भी मंत्री पद के दावेदार माने जा रहे थे, लेकिन कट्टर भाजपाइयों की तुलना में नए शामिल नेताओं को तरजीह दी गई।

चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी साल में मंत्री पद और दायित्वों का बंटवारा इसलिए किया जाता है ताकि संगठन और सरकार के भीतर असंतोष को शांत रखा जा सके, साथ ही जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को साधा जा सके।

हालांकि इस बार शामिल किए गए नए चेहरे इन तर्कों पर कितने खरे उतरते हैं, इसका सही जवाब चुनावी नतीजे ही देंगे।

लेकिन यह भी माना जा रहा है कि मंत्रीमंडल का यह विस्तार पार्टी हित से ज्यादा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की पर्सनल चॉइस पर आधारित है। उन्होंने अपने सुविधा और तालमेल के हिसाब से नेताओं को जगह दी है।

सवाल यह है कि जनता के बीच इसका क्या संदेश जा रहा है। उससे पहले यह समझना जरूरी है कि पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच इस फैसले की क्या मैसेजिंग है।

पिछले चार सालों से भाजपा के दिग्गज नेता और कार्यकर्ता मंत्रीमंडल विस्तार के टलते रहने से निराश थे। और अब जब नाम सामने आए हैं, तो कई चेहरों पर मायूसी देखी जा रही है।

पार्टी के कुछ पुराने कार्यकर्ताओं का कहना है कि कांग्रेस से आए नेताओं के वर्क कल्चर से तालमेल बैठाने में उन्हें कठिनाई हो रही है। वहीं कुछ कार्यकर्ता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

सवाल यह उठता है कि क्या संगठन और सरकार कार्यकर्ताओं की इस नाराजगी को समझ नहीं पाए? और क्या चुनावी साल में भाजपा यह जोखिम लेने को तैयार है?

इन सवालों का जवाब भाजपा के केंद्रीय वर्क स्टाइल में छिपा है, जहां बड़े नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में भेजने की परंपरा देखी गई है।

शायद भाजपा के पास अब बिना पारंपरिक कार्यकर्ता आधार के भी चुनाव जीतने की नई रणनीति है—या कम से कम ऐसा संकेत देने की कोशिश जरूर है।

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